सेवक स्योकाई जानि जानकीस मानै कानि,
सानुकूल सूलपानि नवै नाथ नाँकको ।
देवी देव दानव दयावने ह्वै जोरैं हाथ,
बापुरे बराक कहा और राजा राँकको ॥
जागत सोवत बैठे बागत बिनोद मोद,
ताकै जो अनर्थ सो समर्थ एक आँकको ।
सब दिन रूरो परै पुरो जहाँ-तहाँ ताहि,
जाके है भरोसो हिये हनुमान हाँकको ॥ १२ ॥
सानुग सगौरि सानुकूल सूलपानि ताहि,
लोकपाल सकल लखन राम जानकी ।
लोक परलोकको बिसोक सो तिलोक ताहि,
तुलसी तमाइ कहा काहू बीर आनकी ॥
केसरीकिसोर बंदीछोरके नेवाजे सब,
कीरति बिमल कपि करुनानिधानकी ।
बालक-ज्यों पालहैं कृपालु मुनि सिद्ध ताको,
जाके हिये हुलसति हाँक हनुमानकी ॥ १३ ॥
करुना निधान, बलबुद्धिके निधान, मोद-
महिमानिधान, गुन-ज्ञानके निधान हौ ।
बामदेव-रूप, भूप रामके सनेही, नाम
लेत-देत अर्थ धर्म काम निरबान हौ ॥
आपने प्रभाव, सीतानाथके सुभाव सील,
लोक-बेद-बिधिके बिदुष हनुमान हौ ।
मनकी, बचनकी, करमकी तिहुँ प्रकार,
तुलसी तिहारो तुम साहेब सुजान हौ ॥ १४ ॥
मनको अगम, तन सुगम किये कपीस,
काज महाराजके समाज साज साजे हैं ।
देव-बंदीछोर रनरोर केसरीकिसोर,
जुग-जुग जग तेरे बिरद बिरजे हैं ।
बीर बरजोर, घटि जोर तुलसीकी ओर
सुनि सकुचाने साधु, खलगन गाजे हैं ।
बिगरी सँवार अंजनीकुमार किजे मोहिं,
जैसे होत आये हनुमानके निवाजे हैं ॥ १५ ॥
– सवैया –
जानसिरोमनि हौ हनुमान सदा जनके मन बास तिहारो ।
ढारो बिगारो मैं काको कहा केहि कारन खीझत हौं तो तिहारो ॥
साहेब सेवक नाते ते हातो कियो सो तहाँ तुलसीको न चारो ।
दोष सुनाये तें आगेहुँको होशियार ह्वै हों मन तौ हिय हारो ॥ १६ ॥
तेरे थपे उथपै न महेस, थपै थिरको कपि जे घर घाले ।
तेरे निवाजे गरीबनिवाज बिराजत बैरिनके उर साले ।
संकट सोच सबै तुलसी लिये नाम फटै मकरीके-से जाले ।
बूढ भये, बलि, मेरिहि बार, कि हारि परे बहुतै नत पाले ॥ १७ ॥
सिंधु तरे, बडे बीर दले खल, जारे हैं लंकसे बंक मवा से ।
तैं रन-केहरि केहरिके बिदले अरि-कुंजर छैल छवा से ॥
तोसों समत्थ सुसाहेब सेइ सहै तुलसी दुख दोष दवासे ।
बानर बाज बढे खल-खेचर, लीजत क्यों न लपेटि लवा-से ॥ १८ ॥
अच्छ-बिमर्दन कानन-भानि दसानन आनन भा न निहारो ।
बारिदनाद अकंपन कुंभकरन्न-से कुंजर केहरि-बारो ॥
राम-प्रताप-हुतासन, कच्छ, बिपच्छ, समीर समीरदुलारो ।
पापतेँ, सापतेँ, ताप तिहुँतेँ सदा तुलसी कहँ सो रखवारो ॥ १९ ॥
– घनाक्षरी –
जानत जहान हनुमानको निवाज्यौ जन,
मन अनुमानि, बलि, बोल न बिसारिये ।
सेवा-जोग तुलसी कबहुँ कहा चूक परी,
साहेब सुभाव कपि साहिबी सँभारिये ॥
अपराधी जानि कीजै सासति सहस भांति,
मोदक मरै जो, ताहि माहुर न मारिये ।
साहसी समीरके दुलारे रघुबीरजूके,
बाँह पीर महाबीर बेगि ही निवारिये ॥ २० ॥
लोक-परलोकहुँ तिलोक न बिलोकियत,
तोसे समरथ चप चारिहुँ निहारिये ।
कर्म, काल, लोकपाल, अग-जग जीवजाल,
नाथ हाथ सब निज महिमा बिचारिये ॥
खास दास रावरो, निवास तेरो तासु उर,
तुलसी सो देव दुखी देखियत भारिये ।
बात तरुमूल बाँहुसूल कपिकच्छु-बेलि,
उपजी सकेलि कपिकेलि ही उखारिये ॥ २४ ॥
करम-कराल-कंस भूमिपालके भरोसे,
बकी बकभगिनी काहूतें कहा डरैगी ।
बडी बिकराल बालघातिनी न जात कहि,
बाँहुबल बालक छबीले छोटे छरैगी ॥
आई है बनाइ बेष आप ही बिचारि देख,
पाप जाय सबको गुनीके पाले परैगी ।
पूतना पिसाचिनी ज्यौं कपिकान्ह तुलसीकी,
बाँहपीर महाबीर, तेरे मारे मरैगी ॥ २५ ॥
भालकी कि कालकी कि रोषकी त्रिदोषकी है,
बेदन बिषम पाप-ताप छलछाँहकी ।
करमन कूटकी कि जंत्रमंत्र बूटकी,
पराहि जाहि पापिनी मलीन मनमाँहकी ॥
पैहहि सजाय नत कहत बजाय तोहि,
बावरी न होहि बानि जानि कपिनाँहकी ।
आन हनुमानकी दोहाई बलवानकी,
सपथ महाबीरकी जो रहै पीर बाँहकी ॥ २६ ॥
सिंहिका संहारि बल, सुरसा सुधारि छल,
लंकिनी पछारि मारि बाटिका उजारी है ।
लंक परजारि मकरी बिदारि बारबार,
जातुधान धारि धूरिधानी करि डारी है ॥
तोरि जमकातरि मदोदरि कढोरि आनी,
रावनकी रानी मेघनाद महँतारी है ।
भीर बाँहपीरकी निपट राखी महाबीर,
कौनके सकोच तुलसीके सोच भारी है ॥ २७ ॥
तेरो बालकेलि बीर सुनि सहमत धीर,
भूलत सरीरसुधि सक्र-रबि-राहुकी ।
तेरी बाँह बसत बिसोक लोकपाल सब,
तेरो नाम लेत रहै आरति न काहुकी ॥
साम दान भेद बिधि बेदहू लबेद सिधि,
हाथ कपिनाथहीके चोटी चोर साहुकी ।
आलस अनख परिहासकै सिखावन है,
एते दिन रही पीर तुलसीके बाहुकी ॥ २८ ॥
टूकनिको घर-घर डोलत कँगाल बोलि,
बाल ज्यों कृपाल नतपाल पालि पोसो है ।
कीन्ही है संभार सार अंजनीकुमार बीर,
आपनो बिसारिहैं न मेरेहू भरोसो है ॥
इतनो परेखो सब भांति समरथ आजु,
कपिराज साँची कहौं को तिलोक तोसो है ।
सासति सहत दास कीजे पेखि परिहास,
चीरीको मरन खेल बालकनिको सो है ॥ २९ ॥
आपने ही पापतें त्रितापतें कि सापतें,
बढी है बाँहबेदन कही न सहि जाति है ।
औषध अनेक जंत्र-मंत्र-टोटकादि किये,
बादि भये देवता मनाये अधिकाति है ॥
करतार, भरतार, हरतार, कर्म, काल,
को है जगजाल जो न मानत इताती है ।
चेरो तेरो तुलसी तू मेरो कह्यो रामदूत,
ढील तेरी बीर मोहि पीरतें पिराति है ॥ ३० ॥
दूत रामरायको, सपूत पूत बायको,
समत्थ हाथ पायको सहाय असहायको ।
बाँकी बिरदावली बिदित बेद गाइयत,
रावन सो भट भयो मुठिकाके घायको ॥
एते बडे साहेब समर्थको निवाजो आज,
सीदत सुसेवक बचन मन कायको ।
थोरी बाँहपीरकी बडी गलानी तुलसीको,
कौन पाप कोप, लोप प्रगट प्रभायको ॥ ३१ ॥
देवी देव दनुज मनुज मुनि सिद्ध नाग,
छोटे बडे जीव जेते चेतन अचेत हैं ।
पूतना पिसाची जातुधानी जातुधान बाम,
रामदूतकी रजाइ माथे मानि लेत हैं ॥
घोर जंत्र मंत्र कूट कपट कुरोग जोग,
हनूमान आन सुनि छाडत निकेत हैं ।
क्रोध कीजे कर्मको प्रबोध कीजे तुलसीको,
सोध कीजे तिनको जो दोष दुख देत हैं ॥ ३२ ॥
तेरे बल बानर जिताये रन रावनसों,
तेरे घाले जातुधान भये घर-घरके ।
तेरे बल रामराज किये सब सुरकाज,
सकल समाज साज सजे रघुबरके ॥
तेरो गुनगान सुनि गीरबान पुलकत,
सजल बिलोचन बिरंचि हरि हरके ।
तुलसीके माथेपर हाथ फेरो कीसनाथ,
देखिये न दास दुखी तोसे कनिगरके ॥ ३३ ॥
पालो तेरे टूकको परेहू चूक मूकिये न,
कूर कौडी दूको हौं आपनी ओर हेरिये ।
भोरानाथ भोरेही सरोष होत थोरे दोष,
पोषि तोषि थापि आपनो न अवडेरिये ॥
अंबु तू हौँ अंबुचर, अंब तू हौँ डिंभ, सो न,
बूझिये बिलंब अवलंब मेरे तेरिये ।
बालक बिकाल जानि पाहि प्रेम पहिचानि,
तुलसीकी बाँह पर लामीलूम फेरिये ॥ ३४ ॥
कालकी करलता करम कठिनाई कीधौं,
पापके प्रभावकी सुभाय बाय बावरे ।
बेदन कुभांति सो सहि न जाति राति दिन,
सोई बाँह गही जो गही समीरडावरे ॥
लायो तरु तुलसी तिहारो सो निहारि बारि,
सींचिये मलीन भो तयो है तिहुँ तावरे ।
भूतनिकी आपनी परायेकी कृपानिधान,
जानियत सबहीकी रीति राम रावरे ॥ ३७ ॥
पायँपीर पेटपीर बाँहपीर मुँहपीर,
जरजर सकल सरीर पीरमई है ।
देव भूत पितर करम खल काल ग्रह,
मोहिपर दवरि दमानक सी दई है ॥
हौं तो बिन मोलके बिकानो बलि बारेही तें,
ओट रामनामकी ललाट लिखि लई है ।
कुंभजके किंकर बिकल बूडे गोखुरनि,
हाय रामराय ऐसी हाल कहूँ भई है ॥ ३८ ॥
बाहुक-सुबाहु नीच लीचर-मरीच मिलि,
मुँहपीर-केतुजा कुरोग जातुधान है ।
राम नाम जपजाग कियो चहोँ सानुराग,
काल कैसे दूत भूत कहा मेरे मान है ॥
सुमिरे सहाय रामलखन आखर दोऊ,
जिनके समूह साके जागत जहान है ।
तुलसी सँभारि ताडका-सँहारि भारी भट,
बेधे बरगदसे बनाइ बानवान है ॥ ३९ ॥
बालपने सूधे मन राम सनमुख भयो,
रामनाम लेत माँगि खात टूकटाक हौं ।
परयो लोकरीतिमें पुनीत प्रीति रामराय,
मोहबस बैठो तोरि तरकितराक हौं ।
खोटे-खोटे आचरन आचरत अपनायो,
अंजनीकुमार सोध्यो रामपानि पाक हौं ॥
तुलसी गोसायीँ भयो भोँडे दिन भूलि गयो,
ताको फल पावत निदान परिपाक हौं ॥ ४० ॥
असन-बसन-हीन बिषम-बिषाद-लीन,
देखि दीन दूबरो करै न हाय-हाय को ।
तुलसी अनाथसो सनाथ रघुनाथ कियो,
दियो फल सीलसिंधु आपने सुभायको ॥
नीच यहि बीच पति पायि भरुहायिगो,
बिहायि प्रभु-भजन बचन मन कायको ।
तातेँ तनु पेषियत घोर बरतोर मिस,
फूटि-फूटि निकसत लोन रामरायको ॥ ४१ ॥
जियोँ जग जानकीजीवनको कहायि जन,
मरिबेको बारानसी बारि सुरसरिको ।
तुलसीके दुहूँ हाथ मोदक है ऐसे ठावुँ,
जाके जिये मुये सोच करिहैँ न लरिको ।
मोको झूठो साँचो लोग रामको कहत सब,
मेरे मन मान है न हरको न हरिको ।
भारी पीर दुसह सरीरतेँ बिहाल होत,
सोवू रघुबीर बिनु सकै दूर करिको ॥ ४२ ॥
सीतापति साहेब सहाय हनुमान नित,
हित उपदेसको महेस मानो गुरुकै ।
मानस बचन काय सरन तिहारे पाँय,
तुम्हरे भरोसे सुर मैँ न जाने सुरकै ॥
ब्याधि भूतजनित उपाधि काहू खलकी,
समाधि कीजे तुलसीको जानि जन फुरकै ।
कपिनाथ रघुनाथ भोलानाथ भूतनाथ,
रोगसिंधु क्यों न डारियत गाय खुरकै ॥ ४३ ॥
कहोँ हनुमानसोँ सुजान रामरायसोँ,
कृपानिधान संकरसोँ सावधान सुनिये ।
हरष विषाद राग रोष गुन दोषमयी,
बिरची बिरंचि सब देखियत दुनिये ।
माया जीव कालके करमके सुभायके,
करैया राम बेद कहैँ साँची मन गुनिये ।
तुम्हतेँ कहा न होय हाहा सो बुझैये मोहि,
हौँ हूँ रहोँ मौन ही बयो सो जानि लुनिये ॥ ४४ ॥